शुक्रवार, 20 दिसंबर 2019

Charan

jai maa aawad karni
चारण एक जाति है जो सिंध, राजस्थान और गुजरात में निवास करती है। इस जाति का इतिहास अत्यंत प्राचीन है। वेदों में चार वर्णो का उल्लेख मिलता है,जिनकी उत्पत्ति ब्रह्मा जी से बताई जाती है। जबकि चारण जाति की उत्पत्ति माता पार्वती से बताई जाती है, इसी कारण ये चारो वर्णो से अलग पांचवा वर्ण है । कई अज्ञात लेेेखक चारण जाति का भाटों से संबंध बताते है अथवा उनके परिवेश एवं संस्कृति की तुलना चारणों से करते है । जो कि स्पष्टतः गलत है,चारणों का संबंध केवल शाषक वर्ग के साथ था तथा उनका कर्म उन्हें उचित सलाह एवं मार्गदर्शन देना था। जबकि भाट जाति का कर्म हरएक जाति की वंशावली रखना एवं उसका वाचन करना था।

आने वाली पीढ़ियों के लिए ये विश्वास करना भी मुश्किल होगा कि कभी ऐसे स्त्री-पुरुष भी थे जो छोटी सी अनबन पर पलक झपकते ही अपने शरीर के टुकड़े टुकड़े कर देते। खून की नदी बहने लगती और दृश्य देखने वाला अपने होश खो बैठता।

जो क़ौमें अपने इतिहास को भुला देती है, अपने पूर्वजों के बलिदान को भुला देती है, अपने योद्धाओं और विद्वानों की कद्र नही करती और जो सिपाहियों और किसानों से ज्यादा नाचने गाने वालों को तवज्जो देती है उन्हें आखिरकार गुलाम बना दिया जाता है। यदि आप किसी अद्भुत जाति के बारे में जानना चाहते है,तो निम्नलिखित देखिये :

इतिहास

पिछले 1300 सालों से आज तक भारत निरंतर अनेकानेक धर्मों के हमले झेल रहा है परंतु चरणों,राजपूतों, सिक्खों , मराठाओं और भारत की अन्य वीर जातियों की वजह से आज तक सनातन हिन्दू धर्म जीवित है और रहेगा।

इस्लाम भारत मे उतनी तीव्रता से नही फैला जितना अरब, मिस्र, ईरान, इराक और तुर्की में। आर्यों की भूमि भारतवर्ष में इस्लाम का मुकाबला संसार के सबसे प्राचीन धर्म से हुआ और इतिहास गवाह है कि आज 1300 वर्षों के संघर्ष के बाद भी सम्पूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप में सनातन हिंदू धर्म के अनुयायी अधिसंख्य हैं न कि किसी और धर्म के। चाहे इस्लाम हो या कोई और। अगर ऐसा न हुआ होता तो इस्लाम न केवल हिंदुस्तान बल्कि म्यांमार , चीन और जापान तक फैल जाता।

इस्लाम के हमले 650 ईसवी से ही शुरू हो गए थे। शुरुआत में राजपूतो के सैकड़ों युद्ध अरब, ईरानी, तूरानी और अफगान मुस्लिम आक्रमणकारियो से हुए और सभी हिंदुओ ने ही जीते।

गुजरात सम्राट नागभट्ट , सम्राट भीमपाल, कश्मीर के सम्राट ललितादित्य, कन्नौज के यशोवर्मन, मेवाड़ के बप्पा रावल और राणा कुम्भा और राणा सांगा, जालौर के वीरम देव सोनगरा, अजमेर के पृथ्वीराज चौहान, चालुक्यों के विक्रमादित्य द्वितीय, देहली के तंवर , कालिंजर के राजाओं आदि ने कई बार मुस्लिम आक्रमणकारियों को हराया परंतु चूंकि हमारा देश एक लोकतंत्र है अतः वोट बैंक का महत्व होने से इनका इतिहास नही पढ़ाया जाता ताकि अल्पसंख्यको को ठेस ना पहुँचे। परंतु इस वजह से अनेक भ्रांतिया उत्पन्न हो गयी है।

राजा डार की दो बेटियों ने इस्लामी आक्रमणकारी मुहम्मद बिन कासिम से ऐसा बदला लिया कि बगदाद के ख़लीफ़ा की अगले 200 सालों तक वापस हिम्मत नही हुई भारत पर हमला करने की।

भारत के इतिहास के एक अतिमहत्वपूर्ण पन्ने को विदेशियों ने अंधकारपूर्ण युग (dark ages) कह कर गायब ही कर दिया। ये समय था 600 से लेकर 1100 ईस्वी तक का। ये वो समय था जब इस्लाम को भारत मे बार बार हारना पड़ा था। ये हिन्दुओं की विजय का इतिहास था। इसे हिन्दुओ के आत्मबल को तोड़ने के लिए मिटा दिया गया। जब किसी सभ्यता का आत्मबल चला जाता है तब उसे गुलाम बनाने में आसानी रहती है क्योंकि इससे मनोवैज्ञानिक तौर पर वो सभ्यता पंगु हो जाती है और लड़ने की हिम्मत नही जुटा पाती।

हिन्दू धर्म की चारण जाति: चाह-रण

इन युद्धों में हिन्दू सेनाओ की विजय का प्रमुख कारण एक बेहद विशिष्ट जाति थी जो “चारण” कहलाती थी। राजपूत और क्षत्रिय उसे अपने हरावल (vanguard) में रखते थे। हरावल सेना की वो टुकड़ी होती है जो शत्रु से सबसे पहले भिड़ती है। अग्रिम पंक्ति में चारण योद्धाओं को रखा जाता था। इन्हीं के साथ राज चिन्ह, नक्कारे और पताकाऐं चलती थी।

ये योद्धा और कवि दोनों भूमिकाओं का निर्वाह करते थे। युद्ध मे हरावल के योद्धा और शांति में डिंगल भाषा के कवि और इतिहासकार।

कश्मीर ( चारणों का प्राचीन निवास स्थान)

जैसे कि, राजपूत शब्द राजा+पूत (अर्थात राजा का पुत्र) से बना है। उसी प्रकार, चारण शब्द चाह + रण से बना है अर्थात वह जो रण या युद्ध की चाह रखता है।

वर्ण ‘ह’ का उच्चारण थोड़ा मुश्किल है क्योंकि यह हलक से होता है अतः यह कालांतर में चाहरण से सिर्फ चारण रह गया।

ये एक बेहद खूंख्वार (fierce) जाति थी। ये युद्ध मे काले रंग के वस्त्र धारण करते थे और उन पर पशुबलि का रक्त या लाल रंग लगा होता था। ये दोनों ही हाथों में शस्त्र रखते थे क्योंकि वीरगति प्राप्त करना मोक्ष के समकक्ष समझा जाता था अतः ढाल का उपयोग बहुदा नही किया करते थे। स्त्रियां त्रिशूल धारण करती थी और युद्धों में नेतृत्व करती थी। इनकी वेशभूषा अत्यंत डरावनी होती थी। ये दिखने में भी बड़े खूंख्वार होते थे।

युद्ध होने पर ये अत्यंत रक्तपात करते थे । इस जाति की कुछ देवीयों को बली और शराब भी चढ़ाई जाती है जैसे आवड़ जी या करणी जी परंतु वही कुछ देवीयों जैसे गुजरात की खोडियार आदी को माँस और शराब निषिद्ध है। ऐसे भी उदाहरण मिलते है कि बलि इत्यादि में इनकी दैवीयां बलि दिए गए पशु का रक्तपान करती थी। युद्ध मे हारने पर या अपनी जिद पूरी ना होने पर ये जापान के समुराई योद्धाओं की भाँति स्वयं के शरीर के अंगों को स्वयं ही काट डालते और शत्रुओं को श्राप देकर अपनी जीवनलीला स्वयं समाप्त कर देते क्योंकि युद्ध से वापस आना अपमानजनक समझा जाता था । इस प्रक्रिया को “त्रगु” या “त्राग” कहा जाता था। जापान के समुराई योद्धा इसे ‘हाराकीरी’ कहते है। इस प्रकार ये हिन्दुओ के आत्मघाती हमलावर थे। जहाँ जहाँ भी ऐसा होता वहाँ उन योद्धाओं की याद में पत्थर लगा दिये जाते जिनको “पालिया” कहा जाता था। ये पत्थर अभी भी आप गुजरात और राजस्थान के चारणों के पुराने गाँवो में देख सकते है।

ये पालिये सैकड़ों की तादाद में हर छोटे मोटे गाँवो में लगे हुए है और इस बात की पुष्टि करते है कि सैकड़ों युद्ध हुए थे। परंतु अब ये पालिये ही रह गए हैं। लिखित इतिहास को काफी हद तक नष्ट कर दिया गया है।

चारणों का युद्ध इतिहास पूरी तरह से मिटाने की पुरजोर कोशिश इसलिए हुई क्योंकि युद्ध मे वीरता का सीधा जुड़ाव गौरव से है। अतः बड़ी जातियां ये नही चाहती थी कि कोई ये गौरव उनसे छीने । अतः चारणों को निरंतर हाशिये पर धकेलने की कोशिशें हुई और अभी तक जारी है। दरअसल ये ऐसी जाति थी जिसने अपने आप मे ब्राह्मणों और क्षत्रियों दोनों के अच्छे गुणों का सम्पूर्ण रूप से समावेश कर अपने आप को इस दोनों से अत्यधिक ऊंचा उठा लिया और आम जनमानस इन्हें देवताओं के समकक्ष रखने लगा। अतः ईर्ष्या स्वाभाविक थी और इसका दंश चारणों को झेलना पड़ा। दूसरा चारण अत्यधिक युधोन्मादी होने की वजह से निरंतर राजपूतों को लड़ने के लिए कहते जिससे राजपूतों में धीरे धीरे ये धारणा बनने लगी कि ये हमें अनावश्यक युद्धों में झोंकते रहते है और दोनो में दूरियां बढ़ने लगी।

शांति काल मे चारण वीरगति को प्राप्त योद्धाओं पर एक भाषा विशेष में वीर रस की कविताएं लिखती थी। इस भाषा को “डिंगल” कहते थे। इसका अर्थ होता है भारी-भरकम क्योंकि यह कविता अत्यंत भारी और डरावनी आवाज़ में बोली जाती थी और इसकी एक विशिष्ट शैली होती थी जो अब लुप्त हो चुकी है और अब केवल विरूपण देखने को मिलता है।

1000 ईस्वी के आसपास में डिंगल भाषा में लिखे हुए इस छद को पढ़े

तीखा तुरी न मोणंया, गौरी गले न लग्ग। जन्म अकारथ ही गयो, भड़ सिर खग्ग न भग्ग।।

अर्थात

यदि आपने अपने जीवन में तेज घोड़े नही दौड़ाये, सुंदर स्त्रियों से प्रेम नही किया और रण में शत्रुओं के सर नही काटे तो फिर आपका यह जीवन व्यर्थ ही गया।

एक और उदाहरण देखिए

लख अरियाँ एकल लड़े, समर सो गुणे ओज। बाघ न राखे बेलियां, सूर न राखे फौज।।

अर्थात

चाहे लाखों शत्रु ही क्यों न हो एक योद्धा उसी तेज के साथ युद्ध करता है। जिस प्रकार बाघ को शिकार के लिए साथियों की जरूरत नही होती उसी प्रकार एक योद्धा भी युद्व के लिए फौज का मोहताज नही होता।

इस प्रकार के दोहो और कविताओं से आने वाली पीढ़ियों को युद्ध के लिए निरंतर प्रेरित किया जाता था।

युद्धकाल में ये जाति हिन्दू सेनाओं में अग्र पंक्ति में युद्ध करती थी।

इस प्रकार इस जाति में ब्राह्मणों और क्षत्रियों दोनों के गुण अपने पूरे रौब के साथ विद्यमान होते थे|

यही कारण है कि इतिहासकार इनको ब्राह्मण और क्षत्रिय दोनो ही जातियों से श्रेष्ठ मानते है और आम जन मानस में इन्हें अपनी विशेषताओं के कारण देवताओं का दर्जा प्राप्त है।

भगवत गीता, रामायण और महाभारत में चारणों की उत्पत्ति देवताओं के साथ बतायी गयी है।

पुराणों को लिखने का श्रेय भी चारणों को दिया जाता है। (स्रोत: आईएएस परिक्षा हेतु Tata McGraw Hill की इतिहास की पुस्तकें)

ये किले के द्वार पर हठ कर के अड़ जाते थे और भले राजा स्वयं किला छोड़ कर चला गया हो, शत्रुओं को भीतर नही जाने देते थे। इनकी इसी हठ के कारण कई बार ये सिर्फ अपने परिवार के साथ ही शत्रुओं से भिड़ जाते थे और पूरा कुटुंब लड़ता हुआ मारा जाता। एक बार औरंगजेब ने उदयपुर के जगदीश मंदिर पर हमला किया तो उदयपुर महाराणा अपनी समस्त फ़ौज और जनता के साथ जंगलों में चले गए परंतु उनका चारण जिसका नाम बारहठ नरुजी था, वहीं अड़ गया और औरंगजेब की सेना के साथ लड़ता हुआ अपने पूरे कुटुंब के साथ मारा गया। कहते है उसने कदंब युद्ध किया जिसमें की सर कटने के बाद भी धड़ लड़ता रहता है। उसके पराक्रम को देख कर जहां इनका धड़ गिरा वहाँ मुस्लिम योद्धाओं ने सर झुकाया और उनका एक स्थान बना दिया। जहां उनका सर गिरा वहाँ हिंदुओ ने समाधि बना दी और उस पर महादेव का छोटा सा मंदिर बना दिया। इस आशय का एक शिलालेख अभी भी जगदीश मंदिर के बाहर लगा हुआ है जिसकी कोई देखरेख नही करता। इनका आदमकद फ़ोटो जो कि जगदीश मंदिर में लगा हुआ था, भी महाराणा के वंशजों ने हटवा दिया क्योंकि उनके पूर्वज तो किला छोड़ कर चले गये थे और ये वीरगति को प्राप्त हुए तो इनकी ख्याति अत्यधिक बढ़ गयी थी जो महाराणा के वंशजों को रास नही आई।

इस जाति की महिलाओं ने सैकड़ों बार राजपूत सेनाओं का नेतृत्व कर बाहरी आक्रमणकारियो को हराया और ये राजपूतो में पूजनीय होती थी। आपने राजपूत करणी सेना का नाम तो सुना ही होगा। ये करणी जी चारण जाति में उत्पन्न देवी है। इनका मंदिर देशनोक में है जो कि राजस्थान में बीकानेर के पास है ।

इस जाति की वजह से 800 वर्षो तक राजपूतो ने मुस्लिम आक्रमणकारियो से लोहा लिया। और लगातार युद्ध जीते। इस आशय का एक पत्र जो कि कर्नल जेम्स टॉड ने ब्रिटेन की महारानी को लिखा था आज भी उदयपुर के सिटी पैलेस म्यूजियम में दर्शनार्थ रखा हुआ है।

इस जाति के बारे में एक प्रसिद्ध दोहा है, जो इस प्रकार है

आवड़ तूठी भाटिया, श्री कामेही गौड़ा, श्री बरबर सिसोदिया,श्री करणी राठौड़ां।

अर्थात भाटी राजपूतों को राज, चारण देवी आवड़ ने दिया, श्री कामेही देवी ने राज गौड़ राजपूतों को दिया,श्री बरबर जी ने राज सीसोदियो को दिया,और श्री करणी जी ने राठोड़ों को।

ये सभी राज्य उपरोक्त चारण देवियों ने राजपूतो को दिये।

मामड़जी चारण की बेटी आवड़ ने सिंध प्रान्त के सूमरा नामक मुस्लिम शासक का सिर काट कर उसका राज्य भाटी राजपूतों के मुखिया तनु भाटी को दे दिया। उस राजा ने तनोट नगर बसाया और माता की याद में तनोट राय (तनोट की माता) मंदिर का निर्माण करवाया।

जिस समय आवड़ ये युद्ध सिंध प्रांत में लड़ रही थी उसी समय उसकी सबसे छोटी बहन खोडियार (The Criple) कच्छ के रण में अरब आक्रमणकारियों से युद्ध कर रही थी जिसमे हिन्दू सेनाओं को विजय प्राप्त हुई। कहते है खोडीयार ने अपने रिज़र्व धनुर्धारियों को एकदम से युद्ध मे उतारा जिससे शत्रुओं को लगा कि हज़ारों बाणों की वर्षा कोई अदृश्य धनुर्धारी कर रहे हों। आज पूरा गुजरात खोडीयार का उपासक है। खोडीयार भावनगर राज घराने की कुलदेवी भी है। ये युद्ध 8वीं शताब्दी के आसपास हुए थे। ये खोडीयार चारणों की सबसे शक्तिशाली खांप जिसे वर्णसूर्य (जातियों के सूर्य, अपभ्रंश वणसूर) कहा जाता है कि भी कुलदेवी है।

ये कुल सात बहने थी और सातों जब एक साथ युद्ध के मैदान (जो किअक्सर कच्छ का रण या थार का रेगिस्तान होता था) में प्रवेश करतीं तो दूर से इनके हवा में हिलते काले वस्त्रों, काले अश्वों और चमकते शस्त्रों के कारण ये ऐसी दिखाई देतीं जैसे सात काले नाग एक साथ चल रहे हो। अतः आम जनमानस में ये नागणेचीयां माता अर्थात नागों के जैसी माताएं कहलाईं। इन सातो देवियों की प्रतिमा एक साथ होती है। इन्हें आप जोधपुर के मेहरानगढ़ किले के चामुंडा मंदिर में देख सकते हैं। आजकल इनके इतिहास को भी तहस नहस लड़ने की पुरजोर शाजिशें चल रही है और उल्टी सीधी किताबें भी लिखी जा रही है।

इसी जाति में मोमाय माता का जन्म हुआ। ये महाराष्ट्र में मुम्बादेवी कहलाईं और इन्ही के नाम पर मुंबई शहर का नाम पड़ा।

बीकानेर के संस्थापक राव बीका को बीकानेर का राज्य करणी माता के आशीर्वाद से प्राप्त हुआ और उन्होंने करनी माता के लिये देशनोक में मंदिर का निर्माण भी करवाया। करणी माता ने ही जोधपुर के मेहरानगढ़ किले और बीकानेर के जूनागढ़ किले की नींव रखी और यही दोनों दुर्ग आज भी राठौड़ों के पास है जबकि बाकी राजपूतों के सभी किले उनके हाथ से जा चुके हैं। आम जनमानस इसे भी करणी का चमत्कार मानता है।

बिल गेट्स की सॉफ्टवेयर कंपनी माइक्रोसॉफ्ट ने साम्राज्यों और युद्धों पर आधारित अपने विश्वविख्यात कंप्यूटर गेम ‘साम्राज्यों का युग’ (Age of Empires) में करणी माता को श्रद्धांजलि देते हुए उनका एक wonder (चमत्कार) बनाया है जो गेम में बनने के बाद साम्राज्य जीतने में मदद करता है। लिंक है

माइक्रोसॉफ्ट ने सिर्फ करणी को ही युद्ध की देवी माना है न कि दुर्गा, चामुंडा या भवानी आदि को। इसका कारण ये हो सकता है कि करणी जी मात्र एक मिथक न होकर वास्तव में मौजूद थी।

नारी सशक्तिकरण की शुरुआत चारणों ने 7वीं शताब्दी में ही कर दी थी। इनकी बेटियां जीती जागती देवियों के रूप में पूजी जाने लगी थीं।

एक और सत्य घटना:

1965 के भारत पाक युद्ध मे चारण देवी माँ आवड़ के तनोट स्थित मंदिर जिसे तनोटराय (अर्थात तनोट की माता) के नाम से जाना जाता है, में पाकिस्तान ने 3000 बम भारतीय सेना की टुकड़ी पर गिराए पर एक भी बम नही फटा। इसे सेना ने माता का भारी चमत्कार माना। आज भी माता आवड़ को सेना और BSF की आराध्य देवी माना जाता है। हर शाम BSF के जवान माँ की बेहद ओज पूर्ण आरती करते है जो देखने लायक होती है।


बाद में इस अत्यंत छोटी जाति की अत्यधिक ख्याति देख बड़ी जातियां इनसे ईर्ष्या करने लग गयीं। इससे चारणों के प्रति षडयंत्र होने लगे। मसलन एक ब्राह्मण ने मेवाड़ राज्य के शासक महाराणा कुम्भा से कह दिया कि उसका वध एक चारण करेगा। जिससे डरे हुए कुंभा ने सभी चारणों को मेवाड़ से चले जाने को कहा। जबकि हमीर के जन्म के समय एक चारण देवी ने भविष्यवाणी की थी कि हमीर का यश सब ओर फैलेगा और वो राजा बनेगा। इस पर हमीर की माँ ने कहा कि है देवी यह तो असम्भव है। परंतु असम्भव सम्भव हुआ और हमीर राजा बना। ये गाथा आज भी कुम्भल गढ़ के लाइट एंड साउंड शो में दिखाई जाती है। आप यूट्यूब पर देख सकते हैं।

राजपूतों के लिए चारण दुधारी तलवार के समान थे। पक्ष में लड़ते तो शत्रुओं पर कहर बन कर टूट पड़ते और आत्मघाती हमलावर बन जाते।

वहीं जब अपनी जिद पर अड़ जाते तो राजपूतों के लिए मुश्किल बन जाते। खासकर शादी ब्याह के मौकों पर जब अपनी मांगे पूरी न होने पर रंग में भंग कर देते। युद्ध और त्रगु की धमकी देते। ऐसी घटनाओं से राजपूतों और चारणों में दूरियां बढती गयीं। अब चारण सिर्फ उन्हीं राजपूतों के यहाँ जाते थे जहाँ उनका मान सम्मान बरकरार था। इससे अधिकतर राजपूतों का पतन होता गया जो आज तक जारी है। इसका कारण है कि चारण राजपूतों के गुरू भी थे और उन्हें बचपन से ही वीरता के संस्कार देते थे। बच्चों को बचपन से ही कविताओं, गीतों और दोहो इत्यादि के द्वारा बताया जाता था कि उनके पूर्वज कितने बड़े योद्धा थे और उन्हें भी ऐसा ही बनना है। ये कवित्त चारण स्वयं लिखते थे और इसमे अतिश्योक्ति जानबूझकर की जाती थी क्योंकि ये मानव का स्वभाव है कि वह महामानव का अनुसरण करता है न कि साधारण मनुष्य का। यही कारण है कि हम फिल्मो में नायक को पसंद करते हैं। महान राजपूत और चारण योद्धाओं पर काव्य की रचना कर चारणों ने उन्हें अमर कर दिया। इसलिये हर राजपूत की ये चाह होती थी कि कोई चारण कवि उस पर कविता लिखे। इसके लिए राजपूत मरने को भी तैयार रहते थे। यही कारण है की इन्हें कविराज भी कहा जाता था।

मध्यकाल में भी कई बार चारणों ने राजपूतों को राजा बनाया।

जोधपुर के महाराजा मान सिंह ( शासन 1803–1843) को चारण ठाकुर जुगता वर्णसूर्य ने राज गद्दी दिलवाई। मान सिंह जब केवल नौ साल के थे उनके बड़े भाई जोधपुर महाराजा भीम सिंह ने उन्हें मारने की कोशिश की क्योंकि उनके पुत्र नही हो रहा था तो उनको लगा कि कहीं मान सिंह बड़ा होकर उनसे राज गद्दी न छीन ले। मान सिंह को उनके चाचा शेर सिंह जोधपुर के किले से निकाल कर कोटड़ा ठिकाने के चारण जुगता वर्णसूर्य के पास जालोर के किले में छोड़ आये। पता चलने पर शेर सिंह की दोनों आँखे उनके भतीजे भीम सिंह ने निकलवा दी और प्रताड़ना देकर मार दिया। मारवाड़ की सेना ने जालौर की घेराबंदी कर दी जो कि 11 साल तक रही। अतः मान सिंह करीब 11 साल तक जालौर के किले में रहे और जुगता वणसूर के प्रशिक्षण की बदौलत उन्होंने भाषाओं, शस्त्र और शास्त्र सभी पर भारी महारथ हासिल कर ली। जुगतो जी ने भारी वित्तीय मदद भी मान सिंह जी को दी। ये सब मदद जुगतो जी ने बिल्कुल निःस्वार्थ की क्योंकि न तो मान सिंह गद्दी के उत्तराधिकारी थे न ही उनके राजा बनने की कोई उम्मीद थी। चौबीसों घंटे जालौर जोधपुर की सेना के घेरे में रहता था और निरंतर हमले होते रहते थे। बाद में दैवयोग से भीम सिंह अकाल मृत्यु को प्राप्त हुए और मान सिंह राजा बन गए। राजा बनते वक्त मान सिंह ने जुगतो जी से आशीर्वाद लिया और उन्हें कई प्रकार के विशेषाधिकारों से नवाजा जैसे दोहरी ताज़ीम, लाख पसाव, हाथी सिरोपाव और खून माफ आदि। जुगतो जी को हाथी पर बैठा कर स्वयं मान सिंह आगे आगे पैदल चले और किले के अंतिम द्वार तक छोड़ने आये। उनके गांव कोटड़ा में एक दुर्ग का निर्माण करवाया जो आज भी जुगतो जी के वंशजों के पास है जो कि जुगतावत कहलाते है । मान सिंह आगे चल कर जोधपुर के सबसे काबिल राजा बने। राठौड़ सम्राटों में उनके जैसा विद्वान कोई नही हुआ। उन्होंने ने कई गीतों, कविताओं और दोहों की रचनाएं कीं। राठौड़ शिरोमणि मान सिंह ने जयपुर, उदयपुर और बीकानेर की सयुंक्त सेनाओं को एक साथ युद्ध मे बुरी तरह पराजित किया और जयपुर वालों से तो दो लाख का मुआवजा भी वसूल किया। चूंकि वे राज गद्दी के उत्तराधिकारी नही थे अतः उनके समय मे भरपूर षडयंत्र राजपूत ठाकुरों ने किए। परंतु अपने सुदृढ़ प्रशिक्षण की बदौलत उन्होंने 40 वर्ष तक मारवाड़ पर एकछत्र राज किया जो कि अपने आप मे एक उदाहरण है। जुगतो जी समेत 17 चारण हर वक्त मान सिंह जी के साथ रहते थे। चाहे युद्ध हो या आमोद प्रमोद। महाराजा मान सिंह ने बड़े मार्मिक शब्दों में अपने चारणों का गुणगान किया है और अपनी कविताओं में कहा है कि विकट समय मे जब सभी बंधु बांधवों ने मेरा साथ छोड़ दिया था तब भी ये 17 चारण योद्धा मेरे साथ डटे रहे।

इसी तरह मेवाड़ में राणा हमीर की मदद एक चारण ठाकुर ने पांच सौ घुड़सवार की सेना देकर की।

एक बार गुजरात के पालनपुर राज्य में विद्रोह हो गया। राजा पर उसकी सेना ने ही हमला कर दिया। ऐसी विकट घड़ी में उसने अपने चारण ठाकुर से मदद की गुहार लगाई। इस पर उस चारण ने जो कि बेहद सामर्थ्यवान था ने अरब सिपाहीयों की एक सेना खड़ी कर डाली और विद्रोह को कुचल दिया और राजा का वापस राज तिलक कर दिया। ( स्रोत: पालनपुर राजयानो इतिहास, पेज 9) ऐसी स्थिति में वह चारण स्वयं भी राजा बन सकता था परंतु उसने केवल अपनी मित्रता का मान रखा और विश्वासघात नही किया। चारणों को वैसे भी आम जनमानस देवताओं के समकक्ष रखता था और स्वयं राजा उनके आगे नतमस्तक होते थे अतः उनमे राजा बनने की कोई चाह प्रायः नही होती थी।

करणी द्वारा राव बीका को बीकानेर का राज दिलवाने में मदद करना सर्वविदित है।

चारण बड़े से बड़े राजा को भी गलत बात पर भरे दरबार मे डाँटने से नही हिचकते थे। बड़ी बेबाक और सही राय देते थे चाहे वो कितनी ही बुरी क्यों न लगे। कई बार इसके लिए वे एक विशेष छंद का प्रयोग करते थे जिसे “छंद भुजंग” (serpentine stanza) कहा जाता था। इसका दोहे का प्रभाव काले नाग के डसने जैसा होने से ऐसा नाम दिया गया है। सही और निडर राय देने के कारण हर राजपूत राजा और ठाकुर अपने यहाँ चारण को अवश्य आमंत्रित करता था और बड़ी मान मनुहार के बाद चारण सरदार आते थे। इनको जागीरे और बड़े बड़े सम्मान भेंट में देकर राजपूत प्रसन्न रखते और दरबार मे पास में बिठाते थे। चारणों से दूरियों के कारण राजपूतों में संस्कार समाप्त होते गए और कुरीतियों ने घर कर लिया। अब वे योद्धाओं से गिरकर व्यसनी हो गए। खास कर अंग्रेजो के समय मे। इनको रोकने टोकने वाला कोई नही रहा। जिस जीवन को स्वाभिमानी राजपूत “मुट्ठी भर मिट्टी” से अधिक कुछ नही समझता था उसे अब वह “जिंदगी एक बार मिलती है” में बदल कर देखने लगा। और जैसा कि इतिहास गवाह है अतंतः राजपूतों का पतन हो गया और सत्ता इनके हाथ से निकल कर मुग़लो के पास चली गयी।

राजस्थानी में दरवाजे को बारणा कहा जाता है और चूंकि चारण दरवाजे पर हठ करके अड़ जाते थे इनको बारहठ (बार +हठ) भी कहा जाता है जो कि एक पदवी या उपाधि है। राजपूतों के शादी के समय भी ये दूल्हे को तभी अंदर जाने देते जब वो इनका टैक्स जिसे नेग या त्याग या हक कहा जाता था, इनको भेंट में देता था। ये हक या टैक्स इसलिये कहलाता थे क्योंकि चारण उसी गढ़ या किले की रक्षा करते हुए मारे जाते थे। अतः इनको गढ़वी भी कहा जाता है। विवाह समारोहों में कई बार चारण जिद पर अड़ जाते और टैक्स के रूप में बेहद गैर वाज़िब मांग रखते और पूरा न होने पर बारात से युद्ध या त्रगु की धमकी देते। रंग में भंग के डर से ऐसी मांगो को पूरा करने में राजपूतों के पसीने छूट जाते। चारण ‘वीरमूठ’( वीर की मुट्ठी) भी भरते थे जिसमे स्वर्ण मुद्राएं एक चारण मुट्ठी में भर के लेता था, टैक्स के रूप में। ब्राह्मण सभी जातियों से दान, दक्षिणा और भेंट स्वीकार करते है परन्तु चारण सिर्फ राजपूत की भेंट स्वीकार करते थे अन्य किसी की नही। बाद में राजपूत इनके अत्याचार से परेशान हो गए और चारणों से विनती करके दोनों जातियों के बड़े बुजुर्गों ने ये टैक्स शादी का 2% नियत कर दिया जिससे तोरण के द्वार पर गरीब राजपूत की बेइज्जती न हो । बाद में 1857 के महान क्रांतिकारी चारण, बारहठ केसरी सिंह ने चारणों को त्याग लेने से मना कर दिया। जिसे बड़े पैमाने पर मान लिया गया परंतु गरीब चारण अपना हक लेते रहे।

चारणों को हाशिये पर धकेलने से हिन्दू योद्धाओं की प्रेरणा को भारी आघात पहुँचा। अंग्रेजो के राज के आते ही स्थिति और खराब हो गयी। अब युद्ध समाप्त हो गए जिससे राजपूत राजा आलसी और आरामपसंद हो गए क्योंकि अंग्रेजों ने शांति स्थापित कर दी। युद्ध बंद होने से चारणों की जरूरत और कद्र दोनों कम हो गयी।

मुग़ल राजपूत युद्ध:

खानवा का युद्ध:

इस युद्ध मे बाबर बड़ी मुश्किल से जीता। एलफिंस्टन लिखता है कि संग्राम सिंह अगर एक दिन पहले हमला कर देता तो भारत का इतिहास बदल जाता। राणा (जिसका एक हाथ, एक आँख और एक पैर काम नही करते थे और शरीर पर अस्सी घाव थे) ने बाबर से हुई आमने सामने की भिड़न्त में बाबर का एक हाथ करीब करीब उड़ा ही दिया था। भयंकर रूप से घायल बाबर अपनी जान बचाने तुरंत पीछे हटा। तोपो, तुलगुमा युद्ध पद्धति और अपने सैनिकों को जिहाद के नाम का वास्ता देकर बाबर किसी प्रकार बड़ी मुश्किल से जीता। युद्ध से पहले बाबर ने कुरान हाथ मे लेकर शराब छोड़ने की कसम खायी। राणा सांगा युद्ध मे हारने पर अत्यंत निराश हो गए थे। ऐसे में एक चारण ठाकुर इनसे मिलने गया जिसको इनके सामन्तो ने बड़ी मुश्किल से इनसे मिलवाया क्योंकि उनको डर था कि ये कहीं फिर से राणा को युद्ध के लिये न उकसा दे। वही हुआ। चारण ने महाभारत का दृष्टांत देकर कहा कि धर्म की रक्षा एक क्षत्रिय का कर्तव्य है चाहे उसमे अपने प्राणों की आहुति ही क्यों न देनी पड़े।उसकी प्रेरणा से राणा सांगा फिर लड़ने को उद्धत हो गया। परंतु राणा के ही सामन्तों ने राणा को जहर दे दिया, यह सोच कर की ये और रक्तपात करवाएगा। इस प्रकार मेवाड़ का राणा संग्राम सिंह, जो कि हिंदुओं का सूर्य था, अस्तांचल को चला गया।

इसी राणा संग्राम सिंह का एक चारण सेनापति हरिदास महियारिया, मुस्लिम शासक महमूद मालवा को युद्ध मे हरा कर बंदी बना लाया जिससे राणा अत्यंत प्रसन्न हुआ और उसने चारण को चित्तौड़ का राज्य ही भेंट में दे दिया। जिसे चारण ने विनम्रतापूर्वक अस्वीकार करते हुए सिर्फ 12 गांव स्वीकार किये। परंतु ये तथ्य आपको इतिहास की पुस्तकों में मिलेगा न कि पाठ्य पुस्तकों में।

हल्दीघाटी:

हर युद्ध एक प्रयोजन से लड़ा जाता है। दूसरे युद्ध यानी हल्दीघाटी के युद्ध का मुख्य मकसद था राणा सांगा के प्रपौत्र यानी राणा प्रताप का वध । मात्र इसी प्रयोजन से मुगलों ने मेवाड़ पर हमला किया। परंतु मुग़ल इसमे असफल रहे। न तो वे प्रताप को मार पाए और न ही पकड। कहते है कि अकबर इतना नाराज हुआ की उसने छह महीने तक हल्दीघाटी के युद्ध मे मुग़ल सेना के जनरल मान सिंह से बात तक नही की। चूँकि युद्ध के प्रयोजन को सिद्ध नही किया जा सका अतः ये युद्ध हारा हुआ माना जाएगा।

मेवाड़ के राणाओं का हिंदुओ में वही स्थान है जो इस्लाम मे बगदाद के खलीफा का है अर्थात सिरमौर। जिस अकबर से बगदाद का खलीफा भी थर्राता था उसको महाराणा प्रताप ने बार बार अपमान का घूट पीने को विवश किया। अकबर के साम्राज्य के नक्शे में मेवाड़ एक रक्त बूंद की भाँति स्वतंत्र दिखाई देता था।

इसके अलावा मुग़लो और राजपूतो में कोई खास युद्ध नही हुए। औरंगजेब के समय की एक छोटी लड़ाई में दुर्गादास राठौड़ जब जोधपुर महाराजा बालक अजीत सिंह जी को लेकर आ रहे थे तब मुग़लो से भिड़ंत हुई और मुग़लो को भागना पड़ा। अंग्रेज इतिहासकार कर्नल जेम्स टॉड ने लिखा है कि राठौड़ सामन्त दुर्गादास के साथ एक चारण योद्धा भी था जो अपने दोनों हाथों में तलवारें लेकर बड़ा ही भयंकर युद्ध कर रहा था और अंततः वह भी चंद्रलोक को गया अर्थात वीरगति को प्राप्त हुआ। दुर्गादासजी अजीत सिंह जी को लेकर मारवाड़ आ गए।

अकबर बेहद बुद्धिमान था और तुरंत समझ गया कि हिंदुस्तान में रहकर राजपूतो से लगातार लड़ना मुश्किल है इसलिए उसने आगे बढ़कर वैवाहिक संबंध स्थापित करने की प्रार्थना की।

एकता न होने के कारण अपना स्वाभिमान काफी हद तक खो चुके राजपूतो ने भी समझौता कर लिया। छाती पर पत्थर रख के बेटीयों की बली इन्होंने दी । पर इससे इन्होंने दोनों ओर के हज़ारों निर्दोष लोगों के रक्तपात को भी रोक लिया और इसका श्रेय उनको जाता है और जाना भी चाहिये।

राजपूतों ने स्वयं मुग़लो की बेटियों से कभी विवाह नही किया ताकि उनका स्वयं का वंश खराब न हो। क्योंकि इस्लाम के अनुसार कोई मुस्लिम लड़की सिर्फ मुस्लिम से ही शादी कर सकती है। अतः यदि कोई राजपूत राजा किसी शहजादी से विवाह करता तो उसे पहले इस्लाम कुबूल करना पड़ता। ऐसा करने से तो धर्मपरिवर्तन हो जाता। अतः ऐसा विवाह सम्भव नही था। अतः इस प्रकार का विवाह न करके हिन्दुत्व को जीवित रखा गया।

अकबर का चित्तौड़ अभियान एक पूर्ण रूप से दो सेनाओं के मध्य युद्ध नहीं था। क्योंकि महाराणा उदय सिंह के केवल दो जनरल मेड़तिया राठौड़ जयमल और पत्ता ही वहाँ तैनात थे अपने कुछ 4–5 हज़ार सैनिकों के साथ। बाक़ी ज़्यादातर मज़दूर ही थे क़िले में जब युद्ध हुआ। इसलिए मेवाड़ की सिसोदिया सेना ने युद्ध नही किया। ये पूर्ण रूप से एक तरफा कार्यवाही थी।


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नीदरलैंड की स्कॉलर जेनेट कंफ्रोस्ट जिन्होंने चारणों पर शोध किया।

चारणों के बारे में यदि आप शोध के इच्छुक हों तो जर्मन या नॉर्डिक स्कॉलर्स के लिखे आर्टिकल पढ़ें क्योंकि वे ही इस जाति को ठीक से समझ पाए हैं। इसका कारण है कि ये वाइकिंग्स (8वीं से 11वीं शताब्दि) के वंशज है और वाइकिंग्स भी योद्धा और कवि थे और चारणों के समकालीन भी थे। वाइकिंग्स और चारणों में काफी समानताए है।

चारण भी विशुद्ध आर्य थे और इनका उदगम मध्य एशिया बताया जाता है जहां से ये सर्वप्रथम बैक्ट्रीया और हिमालय में आये और वहाँ आकर इन्होंने पुराणों आदि की रचना की। गीता, रामायण, महाभारत सभी मे इनका उल्लेख मिलता है। विद्वान होने के कारण क्षत्रियों ने इनको अपने साथ रखना शुरू कर दिया और राजा पृथु ने इन्हें तैलंग राज्य सौंप दिया जहां से ये पूरे उत्तर भारत मे फैल गए।

त्रगु:

आने वाली पीढ़ियों के लिए ये विश्वास करना भी मुश्किल होगा कि कभी ऐसे स्त्री-पुरुष भी थे जो छोटी सी अनबन पर पलक झपकते ही अपने शरीर के टुकड़े टुकड़े कर देते। खून की नदी बहने लगती और दृश्य देखने वाला अपने होश खो बैठता।

जो क़ौमें अपने इतिहास को भुला देती है, अपने पूर्वजों के बलिदान को भुला देती है, अपने योद्धाओं और विद्वानों की कद्र नही करती और जो सिपाहियों और किसानों से ज्यादा नाचने गाने वालों को तवज्जो देती है उन्हें आखिरकार गुलाम बना दिया जाता है।

सामाजिक संरचना

भारतीय साहित्य में योगदान
JAI     MAA        SAYAR
By    PRATAP SINGH BARETH KHATUNDRA

शनिवार, 14 दिसंबर 2019

अम्बा हेलो सुण कर आय। करणी कमी ना राखो कांय ।(टेर)

।।जय माँ करणी।।   


अम्बा हेलो  सुण कर  आय। 
करणी कमी ना राखो कांय ।(टेर)

उडती आजै आकाश में मां ,
माथै  आ  मंडराय।
आप बिना अब ओर अम्बा,
किण सूं कैवूं  कांय।।
अम्बा हेलो  सुण कर  आय। 
करणी कमी ना राखो कांय ।


किनियो मेह सुवाप रो 
जिण तप किनो जाय।
हेले आई  हिंगलाजा मां,
करणी नाम कहाय।।
अम्बा हेलो  सुण कर  आय। 
करणी कमी ना राखो कांय ।


काढ़यो मुल्तानी कैद सूं मां,
 शेखा री कर स्हाय।
संभली रुप सजी सुरराया,
 पूगल दियो पुगाय।।
अम्बा हेलो  सुण कर  आय। 
करणी कमी ना राखो कांय ।

चंदू  बीरबड़ बैचरा मां,
 सेहणी सोनल माय। 
आवड़ इन्द्र आवज्यो अर,
 गुण सागर गीगाय।।
अम्बा हेलो  सुण कर  आय। 
करणी कमी ना राखो कांय ।

देर करो न देशाणपत, 
अम्बा बेगी आय।
श्रवण शरणे शंकरी मां,
 साय करण सुरराय।।

अम्बा हेलो  सुण कर  आय। 
करणी कमी ना राखो कांय ।

श्रवण रतनू🙏🙏

जिय जय मां करणी जगदंबा।।1।।

करणी माता रा त्रिभंगी छंद – कवि डुंगर दानजी आशिया (बाळाउ)


।।दोहा।।

जांणी शिव राणी जगत, गढां सुणांणी गल्ल।
वाखाणी च्यारुं वरण, किनीयाणी करनल्ल।।1।।
रुद्राळी काळी रिधू, खैंगाळी खळ खाण।
उताळी आवै सदा, डाढाळी भर डाण।।2।।
दरणी जरणी दैत दळ, भय हरणी भुज लंब।
अशरण शरणी अम्बिका, जय करणी जगदंब।।3।।

।।छंद – त्रिभंगी।।

जय जय जग जरणी भव भय हरणी खळ दळ दरणी खग धरणी।
भू जळ खेचरणी पय निझरणी शंकर घरणी चख अरणी।
सेवक कज सरणी किरपा करणी मात प्रसरणी भुज लंबा।
तारण भव तरणी वेदां वरणी जय जग जरणी जगदंबा।
जिय जय मां करणी जगदंबा।।1।।

किनिया कुळ जाई देवल माई पितु मेहाई घर आई।
थळ मंगळ थाई जोत जगाई मामडियाई प्रगटाई।
गुण भगतां गाई, सुरां सहाई, शुंभ खपाई निश्शुंभा।
तारण भव तरणी वेदां वरणी जय जग जरणी जगदंबा।
जिय जय मां करणी जगदंबा।।2।।

जगडू बौपारी, जाज हंकारी, कोस हजारी, थी वारी।
तूफान तैयारी, भौ दधि भारी, तबै पुकारी, महतारी।
सुण भुजां पसारी, नाव किनारी, आप उतारी, श्री अंबा।
तारण भव तरणी वेदां वरणी जय जग जरणी जगदंबा।
जिय जय मां करणी जगदंबा।।3।।

खाती कमठाणी, कूप खुदाणी, कीण बिठाणी, तद ताणी।
नह जोग ढळाणी, अध विच आंणी, लाव पुरांणी, लुंटांणी।
रटियो सुरराणी, हे किनियाणी, वरत संधाणी, वणि दम्बा।
तारण भव तरणी वेदां वरणी जय जग जरणी जगदंबा।
जिय जय मां करणी जगदंबा।।4।।

कतारि सिधाया, देश पराया, नाज भराया, लदवाया।
बिच ऊंट थकाया, तूटा पाया, चौथू गाया, महमाया।
सांची सुरराया, करी सहाया, थिर पग थाया, ज्युं थम्बा।
तारण भव तरणी वेदां वरणी जय जग जरणी जगदंबा।
जिय जय मां करणी जगदंबा।।5।।

जादम जकडाई, शेखो भाई, कैद बैठाई, मुगलाई।
तद ही भौजाई, अरज कराई, करो सहाई, थैं बाई।
मुलतान सिधाई, जैल छुडाई, शेखो ल्याई, अविलंबा।
तारण भव तरणी वेदां वरणी जय जग जरणी जगदंबा।
जिय जय मां करणी जगदंबा।।। 6।।

कान्हा मतिहीना, कही मलीना, वादजु कीना, दुःख दीना।
तुं तौ छळ छीना, मंत्र अधीना, मै लखलीना, सगतीना।
अरि भई करीना, हथ्थळ दीना, पळमंह कीना परलंबा।
तारण भव तरणी वेदां वरणी जय जग जरणी जगदंबा।
जिय जय मां करणी जगदंबा।।7।।

काबुल कंधारं, भूपति भारं, जंग विचारं, जैतारं।
लंघर लिय लारं, असुर अपारं, तीस हजारं, तोखारं।
सुणीयै नृप सारं, कीध पुकारं, लहो उबारं, अवलम्बा।
तारण भव तरणी वेदां वरणी जय जग जरणी जगदंबा।
जिय जय मां करणी जगदंबा।।8।।

देशांण पधारा, नृप चढी न्यारा, शरण तिहारा, साधारा।
है राज तिहारा, वण रखवारा, आप हमारा, आधारा।
भंजण दुःख भारा, धणी धरारा, अन्त सहारा, तौ अम्बा।
तारण भव तरणी वेदां वरणी जय जग जरणी जगदंबा।
जिय जय मां करणी जगदंबा।।9।।

भूपत दुःख भाळी, दीन दयाळी, प्रगटी काळी, परचाळी।
चण्डी चिरताळी, कह्यो कृपाळी, वाट निहाळी, मो वाळी।
आऊं ऊंताळी, तीजी ताळी, दुश्मण गाळी, दूदम्बा।
तारण भव तरणी वेदां वरणी जय जग जरणी जगदंबा।
जिय जय मां करणी जगदंबा।।10।।

लख नव ले लारां, सिंघ सवारां, खप्पर धारां, खावारां।
कीनी किलकारां, हो हाकारां, मुगल पुकारां, हा मारां।
भग्गा दळ भारां, जैत जितारां, लाज उबारां, कर लम्बा।
तारण भव तरणी वेदां वरणी जय जग जरणी जगदंबा।
जिय जय मां करणी जगदंबा।।11।।

मोरी कम मत्ती, किम बरणत्ती, मा कीरत्ती है अत्ती।
कवि डुंगर कत्थी, मुजब उकत्ती, दी सुरसत्ती, तौ प्रत्ती।
तुं सीता सत्ती, आद शगत्ती, तुं सिर रत्ती, तुं रंभा।
तारण भव तरणी वेदां वरणी जय जग जरणी जगदंबा।
जिय जय मां करणी जगदंबा जगदंबा।।12।।

।।छप्पय।।

जय जरणी जगदंब, तरण भव सागर तरणी।
भय हरणी भुज लंब, धरण अरु अंबर धरणी।
वेद वरणी अवलंब, परण अरु रही अपरणी।
दरणी शुंभ निशुंभ, करण सेवग सुख करणी।
चख अरणि घरणि शंकर चवौ, मां निझरणी तुं मधू।
दे करण चरण डुंगर दखै, शरण रखै मेहासधू।।1।।

~~कवि डुंगर दानजी आशिया (बाळाउ)

जी खेतर पाला घणी खमा

भैरवाष्टक – डॉ. शक्तिदान कविया


।।सोरठा।।

भैरु भुरजालाह, दिगपाला बड दैव तूं।
रहजै रखवालाह, नाकोडा वाला निकट।।

।।छंद – त्रिभंगी।।

नाकोडा वाला, थान निराला, भाखर माला बिच भाला।
कर रुप कराला, गोरा काला, तु मुदराला चिरताला।
ध्रुव दीठ धजाला, ओप उजाला, रूपाला आवास रमा।
भैरु भुरजाला, वीर वडाला, खैतर पाला दैव खमा।
जी खेतर पाला घणी खमा…।।1।।

मैला वड मांचै, रामंत रांचै, डूंगर आछै छिब डांणां।
साप्रत मन साचै, जात्री जांचै, वाचै कीरण ब्रमाणा।
घूघर घम्मावै, धम्म धमावै, नाचै भोपा सीस नमा।
भैरू भुरजाला, वीर वडाला, खैतरपाला घणी खम्मा।
जी खेतर पाला दैव खमा…।।2।।

अलगा सु आवै, ध्यानी ध्यावै, पूज करावै सुख पावै।
वड ढोल बजावै, गिर गुंजावै, हिय ऊमावै, हरसावै।
गुणियण जस गावै, जोत जगावै, श्रीफल लावै प्रात समा।
भैरु भुरजाला, वीर वडाला, खैतरपाला देव खमा।
जी खैतरपाला घणी खमा…।।3।।

मिण धारी मोटा, आवै ओटा, धर धूपोटा ध्यान धरै।
गुल मिसरी गोटा, चाढै चोटा, भांगै तोटा रिद्व भरै।
घूमावै घोटा, दैवै दोटा, खोटा दिन मेटै विखमा।
भैरू भुरजाला, वीर वडाला, खैतर पाला दैव खमा।
जी खैतर पाला घणी खमा…।।4।।

कलजुग नर कंके, आय असंके, रावत रंकै नाम रटे।
डारण सुण डंके, सात्रव संके, हंके दाणव दैत हटै।
टांमक दुय टंकै, बाजत बंकै, डाक डमंकै डमडम्मा।
भैरू भुरजाला, वीर वडाला, खैतरपाला दैव खम्मा।
जी खैतरपाला घणी खमा…।।5।।

चांमड रा चैला, खिलकत खैला, बावन भैला बबरैला।
सिंदुर सजैला, तैल तमैला, अतर फुलैला, अलबैला।
राजै रंगरैला, मिटै झमैला, थू भर थैला द्रव थमा।
भैरु भुरजाला, वीर वडाला, खैतरपाला घणी खमा।
जी खैतर पाला दैव खमा…।।6।।

डूंगर डीगोडा, बीच बस्योडा, नैस निजोडा नाकोडा।
दरसण कज दोडा, आवै ओडा, खडिया घोडा जाखोडा।
भाविक भलोडा, सज सैंजोडा, जात दियोडा दैत जमा।
भैरु भुरजाला, वीर वडाला, खैतरपाला दैव खमा।
जी खेतरपाला घणी खमा…।।7।।

सिंवरै सुभियांणै, वखत विहाणे, माया माणै तिके मही।
मांदगी मैटाणै, आनंद आणै, सांच ठिकांणै न्याय सही।
परचा परियांणै, जग सह जाणै, पूजांणै थानक प्रतमा।
भैरु भुरजाला, वीर वडाला, खेतरपाला दैव खमा।
जी खैतरपाला घणी खमा…।।8।।

।।छप्पय कलश रो।।

नमो भैरवानाथ, साथ सैवगां सिघाला।
निज नाकोडै नेस, जबर ज़ोगेस जटाला।
नगर महैवै निकट, विकट भाखरां बिचालै।
थानंक दैवां थाट, पाट विरदां प्रतपालै।
चख चोल डोल दीसै चमक, डमक धुनी कर डैरवां।
वीणवै सगत बजरंग बली, भली करै तु भैरवा।।

।।महात्म्य, सोरठा।।
ओ अष्टक अखियात, नित प्रत भैरव नाथ रो।
पढे सुणै जो प्रात, रात दिवस आनंद रहै।।

~~डा. शक्तिदानजी कविया, बिराई
प्रैषक – मोहनसिंह रतनू, चौपासणी, जोधपुर

Shri aawad mata ji jivan prichye

श्री महामाया आवड़ा देवी ने मामड़जी मादा शाखा के यहाँ जन्म धारण किया , मामड़जी जी निपुतियां थे , एक बार अपने घर से कहीबहार जा रहे थे उस समय भाट जाति की कन्याए जो सामने से जा रही थी उन कन्याओ ने मामड़जी को देख रास्ते मे अपूठी खड़ी हो गईक्योकि सुबह के समय निपुतियें व्यक्ति का कोई मुह देखना नही चाहता , इस बात का रहस्य मामड़जी को समझ मे आ गया , वह दुखी होकर वापिस घर आ गए , मामड़जी के घर पर आदि शक्ति का एक छोटा सा मन्दिर था , वहा पुत्र कामना से अनशन धारण कर सात दिन तकबिना आहार मैया की मूर्ति के आगे बेठे रहे , आठवे दिन उन्होंने दुखी होकर अपना शरीर त्यागने के लिए हाथ मे कटारी लेकर ज्युहीं मरनेलगे उसी समय शिव अर्धांगनी जगत जननी गवराजा प्रसन्न हुवे , उन्होंने कहा - तुने सात दिन अनशन व्रत रखा हे , इसलिए मे सात रूपोंमे तुम्हारे घर पुत्री रूपों मे अवतार धारण करुगी और आठवे रूप मे भाई भैरव को प्रगट करुँगी , तुम्हे मरने की कोई आवश्यकता नही हे , इतना कह कर मातेश्वरी अंतरध्यान हो गई ! सवंत ८०८ चैत्र शुद्धी नम शनिवार के दिन (उमट) आई नाम से अवतार धारण किया ! इसी क्रम मे होल - हुली (हुलास बाई ) , गेल - गुलीगुलाब बाई ) , राजू - रागली (रंग बाई) , रेपल - रेपली (रूपल बाई ) , साँची - साचाई (साँच बाई ) व सबसे छोटी लंगी (लघु बाई ) खोड़ियारआदि नामों से सातों बहनों कर जन्म हुवा ! जिसमे महामाया आवड़ व सबसे छोटी लघु बाई - खोड़ियार सर्वकला युक्त शक्तियाँ का अवतारबताया गया ! इस प्रकार आठवे रूप मे भाई का जन्म बताया गया , जिसका नाम मेहरखा था 
मातेश्वरी का जन्म स्थान बलवीपुर जिला सौराष्ट्र , रोहिशाला ग्राम बताया गया हे ! उस समय उक्त स्थान का अन्तिम राजा शिलादिव्य था , कुछ समय पश्चात सिंध प्रान्त जहा हिंदू शासक हमीर समा राज्य करता था उस समय अरब स्थान के सम्राट मोहम्मद कासम न जबरदस्तीराजा का धर्म परिवर्तन कराया गया था उसने बादशाह की गुलामी करते हुवे अपना नाम अमर सुमरा रख दिया , सुमरा ने अपनी प्रजा परधर्म परिवर्तन करने का अनैतिक दबाव डाला , इस प्रान्त मे चारण जाति के अनेक ग्राम थे , उन्होंने धर्म परिवर्तन का विरोध किया , इससेकुपित होकर सुमरा चारण जाति के साथ अत्याचार करने लगा तब अनेक चारण परिवार वतन छोड़कर सौराष्ट्र प्रान्त की तरफ़ चल दिए , उक्त सत्य घटना का मातेश्वरी आवड़ा माता से चारण जाति व अन्य आर्य जाति को अनार्य बनाने का कुकर्म व सुमरा शाशक के अत्याचार कावर्णन किया , महामाया ने भक्तो का दुख दूर करने के लिए सपरिवार शिन्ध प्रान्त को गमन किया , बिच रास्ते मे हाकडा नामक समुन्दर थाउसका शोषण किया उक्त आवड़ा माता ने मांड प्रदेश मे हाकडा समुन्दर था उसका शोषण करते हुवे तणोट महाराजा तणु को दर्शन देकरमहामाया पंजाब प्रान्त समासटा प्रदेश के शाशक लाखियार जाम को दर्शन देने पधारी , उक्त जाम आवड़ा माता का भगत था वह माड़ राजालणु की राजधानी अपने अधिकार मे करना चाहता था लेकिन राजा तणु भी आवड़ा माता का अनन्य भगत था , इस बाबत दोनों नरेशों कीआपसी टकराहट रुकवाते हुवे मैया ने सिंध प्रान्त हमीरा सुमरा जो आर्य प्रजा को अनार्य बना रहा था , जगत जननी ने अदृश्य रूप मेलाखियार जाम की सहायता की व सुमरा शाशक को नामोनिशान मिटा दिया ! 

आवड़जी कच्छ प्रान्त की रहने वाली थी , मामड़जी चारण की पुत्री थी, इनका जन्म ८८८ सवंत आठ सो अठयासी बताया गया हे ! माड़ प्रदेश (जैसलमेर) के भाटी शाशको की अराध्य देवी थी ! यहाँ तेमड़ा नामक दृष्ट राक्षस का संहार करने से तेमडे राय नाम से प्रचलित हुयी ! यह सात बहिने थी , कच्छ प्रान्त से सिंध प्रान्त से हाकड़ा नामक समुन्दर का अस्तित्तव मिटाकर माड़ प्रदेश में अपना निवास स्थान बनाया जहा प्रजा पालक भाटी शासको की हमेशा सहायक रही!वर्तमान में माड़ प्रदेश में रहेनेवाली चारण जातियों में प्रमुख बारहट, रतनु आदि शाखा ओ का उदय आवड जी के समय के बाद हुवा हे ! 
श्री मेहाजी कीनिया रचित काव्य :- 
कवि मेहाजी वंदना करते हुवे कहते हे की मैया शुम्भ निशुम्भ नामक असुरो का संहार करने वाली देवी आवड तुम हो , तुम्हारी राम , शिव , ब्रह्मा, महेश आदि देव हमेशा तपस्या और वाणी से स्मरण करते हे , तुम आवड देवी आदि अनंत हो में आपकी वंदना करता हु ! 

कवि कहते हे मातेश्वरी आप ने अपनी अलख रूपी इच्छा शक्ति से चारण देव मामड जी के घर दुःख दूर करने और भक्तो को आनंदीत कर ने के उद्देश्य से सात बहिनों और एक भाई के रूप में पालणे में शशरीर रूप प्रगट किया , प्रूव में असुरो का वध करने वाली मैया आपने आवड नाम धारण किया , शुम्भ , निशुम्भ जैसे अनेको असुरो को नाश करने वाली आवड आदि आप ही हो ! 

मैया के जन्म स्थान के बारे में कवि कहते हे , आपने चेलक नामक ग्राम में मामड जी के घर जाल नामक वृक्ष को पोधे का रोपण किया जो बहूत पुराना वृक्ष था , जिसकी श

सदा सहाय बेग आय, हाण दोख हारणी।

🚩करणी शरणम्🚩
=============
 रिछपाल बारहठ रजवाडी़
         !! दोहा !!
पैली सुरसत प्राथना ,
करू निमण कर जोड़ !
हियै विराजो कर हरख ,
काटो विघन किरोड़ !!

साय रहिजै मेह  सुता ,
रख जे सुत री लाज !!
आखर दे मां उज्जला,
लहां शरण हिगलाज !!

सुरसत आखर सांपजै ,
दध आखर दिय टाल !
उक्ती दे मां ईशवरी ,
रख शरणै रिछपाल !!

 🙏छन्द जात-नाराच🙏
==================
(रिछपाल सिंह बारहठ कृत)
-------------🚩-------------
पुजूँ प्रभात जोड़ हाथ,
आव मात ईसरी!
रखो रुखाळ हो कृपाळ,
 मात थे महेसरी !
करूँ पुकार ले अधार,
धीर भीर धारणी
सदा सहाय बेग आय,
हाण दोख हारणी।।(1)

डुबी जहाज देय आवाज,
 तार जै शाह नै!
गऊ दुहेन्त तारयो,
 बधाय मात बाँह नै !
करी सहाय जोग माय,
 आय भवा तारणी!
सदा सहाय बेग आय,
हाण दोख हारणी।।(2)

बचाय आज मात लाज,
 आय बेर बंकरी!
कियो ज कैद सिंध में
छुडा़य शेख शंकरी!
भरी उडाण आसमाण,
भ्रात ल्याइ चारणी!
सदा सहाय बेग आय,
हाण दोख हारणी।।(3)

बिकाण बंक रो सुजाण,
राण ध्याव्व राजला!
तुरक्क तूझ होवतां ,
बिगाड़ चाव्व काजला!
बिचाळ छोड़ बाछडा़,
नोरजा छुटावणी  !
सदा सहाय बेग आय,
हाण दोख हारणी।।(4)

धरा धुजाण अगवाण ,
 ल्याय माय भैरवां !
घमंक बाज घूघरा ,
बजात संग डेरवाँ !
रमंत रास मात खास ,
दिलाँ दया धारणी !
सदा सहाय बेग आय,
हाण दोख हारणी।।(5)

सुणंत टेर आ अबेर,
देर मात ना करी !
करंत दया रिधू मया,
ढील डील ना धरी !
रही छत्राळ माँ डढाळ,
सार काज सारणी!
सदां सहाय बेग आय,
हाण दोख हारणी !! (6)

नमूँ हमेश माँ रिधेश ,
लेय सार दास री !
अट्टल है अधार मात,
पूर आश खास री!
पात पाल रीछपाल,
आल को उबारणी!!
सदां सहाय बेग आय,
हाण दोख हारणी!!(7)
================
           !! छप्पय !!
जय करणी जगदम्ब,सुणो माँ साद हमारो!
जय करणी जगदम्ब, आय माँ कष्ट निवारो!
जय करणी जगदम्ब, एक है आसरो थाँरो !
जय करणी जगदम्ब,आय कर पूत उबारो।
सेवक तणी रहिज्यो सदा, रक्षक मात राजेश्वरी।
करजोड़ रिछपाल कहे,सुणो साद परमेसरी ।।
🙏🙏🙏🙏🚩🙏🙏🙏🙏
रिछपाल सिंह बारहठ **रजवाडी़** कृत

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