शनिवार, 14 दिसंबर 2019

जिय जय मां करणी जगदंबा।।1।।

करणी माता रा त्रिभंगी छंद – कवि डुंगर दानजी आशिया (बाळाउ)


।।दोहा।।

जांणी शिव राणी जगत, गढां सुणांणी गल्ल।
वाखाणी च्यारुं वरण, किनीयाणी करनल्ल।।1।।
रुद्राळी काळी रिधू, खैंगाळी खळ खाण।
उताळी आवै सदा, डाढाळी भर डाण।।2।।
दरणी जरणी दैत दळ, भय हरणी भुज लंब।
अशरण शरणी अम्बिका, जय करणी जगदंब।।3।।

।।छंद – त्रिभंगी।।

जय जय जग जरणी भव भय हरणी खळ दळ दरणी खग धरणी।
भू जळ खेचरणी पय निझरणी शंकर घरणी चख अरणी।
सेवक कज सरणी किरपा करणी मात प्रसरणी भुज लंबा।
तारण भव तरणी वेदां वरणी जय जग जरणी जगदंबा।
जिय जय मां करणी जगदंबा।।1।।

किनिया कुळ जाई देवल माई पितु मेहाई घर आई।
थळ मंगळ थाई जोत जगाई मामडियाई प्रगटाई।
गुण भगतां गाई, सुरां सहाई, शुंभ खपाई निश्शुंभा।
तारण भव तरणी वेदां वरणी जय जग जरणी जगदंबा।
जिय जय मां करणी जगदंबा।।2।।

जगडू बौपारी, जाज हंकारी, कोस हजारी, थी वारी।
तूफान तैयारी, भौ दधि भारी, तबै पुकारी, महतारी।
सुण भुजां पसारी, नाव किनारी, आप उतारी, श्री अंबा।
तारण भव तरणी वेदां वरणी जय जग जरणी जगदंबा।
जिय जय मां करणी जगदंबा।।3।।

खाती कमठाणी, कूप खुदाणी, कीण बिठाणी, तद ताणी।
नह जोग ढळाणी, अध विच आंणी, लाव पुरांणी, लुंटांणी।
रटियो सुरराणी, हे किनियाणी, वरत संधाणी, वणि दम्बा।
तारण भव तरणी वेदां वरणी जय जग जरणी जगदंबा।
जिय जय मां करणी जगदंबा।।4।।

कतारि सिधाया, देश पराया, नाज भराया, लदवाया।
बिच ऊंट थकाया, तूटा पाया, चौथू गाया, महमाया।
सांची सुरराया, करी सहाया, थिर पग थाया, ज्युं थम्बा।
तारण भव तरणी वेदां वरणी जय जग जरणी जगदंबा।
जिय जय मां करणी जगदंबा।।5।।

जादम जकडाई, शेखो भाई, कैद बैठाई, मुगलाई।
तद ही भौजाई, अरज कराई, करो सहाई, थैं बाई।
मुलतान सिधाई, जैल छुडाई, शेखो ल्याई, अविलंबा।
तारण भव तरणी वेदां वरणी जय जग जरणी जगदंबा।
जिय जय मां करणी जगदंबा।।। 6।।

कान्हा मतिहीना, कही मलीना, वादजु कीना, दुःख दीना।
तुं तौ छळ छीना, मंत्र अधीना, मै लखलीना, सगतीना।
अरि भई करीना, हथ्थळ दीना, पळमंह कीना परलंबा।
तारण भव तरणी वेदां वरणी जय जग जरणी जगदंबा।
जिय जय मां करणी जगदंबा।।7।।

काबुल कंधारं, भूपति भारं, जंग विचारं, जैतारं।
लंघर लिय लारं, असुर अपारं, तीस हजारं, तोखारं।
सुणीयै नृप सारं, कीध पुकारं, लहो उबारं, अवलम्बा।
तारण भव तरणी वेदां वरणी जय जग जरणी जगदंबा।
जिय जय मां करणी जगदंबा।।8।।

देशांण पधारा, नृप चढी न्यारा, शरण तिहारा, साधारा।
है राज तिहारा, वण रखवारा, आप हमारा, आधारा।
भंजण दुःख भारा, धणी धरारा, अन्त सहारा, तौ अम्बा।
तारण भव तरणी वेदां वरणी जय जग जरणी जगदंबा।
जिय जय मां करणी जगदंबा।।9।।

भूपत दुःख भाळी, दीन दयाळी, प्रगटी काळी, परचाळी।
चण्डी चिरताळी, कह्यो कृपाळी, वाट निहाळी, मो वाळी।
आऊं ऊंताळी, तीजी ताळी, दुश्मण गाळी, दूदम्बा।
तारण भव तरणी वेदां वरणी जय जग जरणी जगदंबा।
जिय जय मां करणी जगदंबा।।10।।

लख नव ले लारां, सिंघ सवारां, खप्पर धारां, खावारां।
कीनी किलकारां, हो हाकारां, मुगल पुकारां, हा मारां।
भग्गा दळ भारां, जैत जितारां, लाज उबारां, कर लम्बा।
तारण भव तरणी वेदां वरणी जय जग जरणी जगदंबा।
जिय जय मां करणी जगदंबा।।11।।

मोरी कम मत्ती, किम बरणत्ती, मा कीरत्ती है अत्ती।
कवि डुंगर कत्थी, मुजब उकत्ती, दी सुरसत्ती, तौ प्रत्ती।
तुं सीता सत्ती, आद शगत्ती, तुं सिर रत्ती, तुं रंभा।
तारण भव तरणी वेदां वरणी जय जग जरणी जगदंबा।
जिय जय मां करणी जगदंबा जगदंबा।।12।।

।।छप्पय।।

जय जरणी जगदंब, तरण भव सागर तरणी।
भय हरणी भुज लंब, धरण अरु अंबर धरणी।
वेद वरणी अवलंब, परण अरु रही अपरणी।
दरणी शुंभ निशुंभ, करण सेवग सुख करणी।
चख अरणि घरणि शंकर चवौ, मां निझरणी तुं मधू।
दे करण चरण डुंगर दखै, शरण रखै मेहासधू।।1।।

~~कवि डुंगर दानजी आशिया (बाळाउ)

जी खेतर पाला घणी खमा

भैरवाष्टक – डॉ. शक्तिदान कविया


।।सोरठा।।

भैरु भुरजालाह, दिगपाला बड दैव तूं।
रहजै रखवालाह, नाकोडा वाला निकट।।

।।छंद – त्रिभंगी।।

नाकोडा वाला, थान निराला, भाखर माला बिच भाला।
कर रुप कराला, गोरा काला, तु मुदराला चिरताला।
ध्रुव दीठ धजाला, ओप उजाला, रूपाला आवास रमा।
भैरु भुरजाला, वीर वडाला, खैतर पाला दैव खमा।
जी खेतर पाला घणी खमा…।।1।।

मैला वड मांचै, रामंत रांचै, डूंगर आछै छिब डांणां।
साप्रत मन साचै, जात्री जांचै, वाचै कीरण ब्रमाणा।
घूघर घम्मावै, धम्म धमावै, नाचै भोपा सीस नमा।
भैरू भुरजाला, वीर वडाला, खैतरपाला घणी खम्मा।
जी खेतर पाला दैव खमा…।।2।।

अलगा सु आवै, ध्यानी ध्यावै, पूज करावै सुख पावै।
वड ढोल बजावै, गिर गुंजावै, हिय ऊमावै, हरसावै।
गुणियण जस गावै, जोत जगावै, श्रीफल लावै प्रात समा।
भैरु भुरजाला, वीर वडाला, खैतरपाला देव खमा।
जी खैतरपाला घणी खमा…।।3।।

मिण धारी मोटा, आवै ओटा, धर धूपोटा ध्यान धरै।
गुल मिसरी गोटा, चाढै चोटा, भांगै तोटा रिद्व भरै।
घूमावै घोटा, दैवै दोटा, खोटा दिन मेटै विखमा।
भैरू भुरजाला, वीर वडाला, खैतर पाला दैव खमा।
जी खैतर पाला घणी खमा…।।4।।

कलजुग नर कंके, आय असंके, रावत रंकै नाम रटे।
डारण सुण डंके, सात्रव संके, हंके दाणव दैत हटै।
टांमक दुय टंकै, बाजत बंकै, डाक डमंकै डमडम्मा।
भैरू भुरजाला, वीर वडाला, खैतरपाला दैव खम्मा।
जी खैतरपाला घणी खमा…।।5।।

चांमड रा चैला, खिलकत खैला, बावन भैला बबरैला।
सिंदुर सजैला, तैल तमैला, अतर फुलैला, अलबैला।
राजै रंगरैला, मिटै झमैला, थू भर थैला द्रव थमा।
भैरु भुरजाला, वीर वडाला, खैतरपाला घणी खमा।
जी खैतर पाला दैव खमा…।।6।।

डूंगर डीगोडा, बीच बस्योडा, नैस निजोडा नाकोडा।
दरसण कज दोडा, आवै ओडा, खडिया घोडा जाखोडा।
भाविक भलोडा, सज सैंजोडा, जात दियोडा दैत जमा।
भैरु भुरजाला, वीर वडाला, खैतरपाला दैव खमा।
जी खेतरपाला घणी खमा…।।7।।

सिंवरै सुभियांणै, वखत विहाणे, माया माणै तिके मही।
मांदगी मैटाणै, आनंद आणै, सांच ठिकांणै न्याय सही।
परचा परियांणै, जग सह जाणै, पूजांणै थानक प्रतमा।
भैरु भुरजाला, वीर वडाला, खेतरपाला दैव खमा।
जी खैतरपाला घणी खमा…।।8।।

।।छप्पय कलश रो।।

नमो भैरवानाथ, साथ सैवगां सिघाला।
निज नाकोडै नेस, जबर ज़ोगेस जटाला।
नगर महैवै निकट, विकट भाखरां बिचालै।
थानंक दैवां थाट, पाट विरदां प्रतपालै।
चख चोल डोल दीसै चमक, डमक धुनी कर डैरवां।
वीणवै सगत बजरंग बली, भली करै तु भैरवा।।

।।महात्म्य, सोरठा।।
ओ अष्टक अखियात, नित प्रत भैरव नाथ रो।
पढे सुणै जो प्रात, रात दिवस आनंद रहै।।

~~डा. शक्तिदानजी कविया, बिराई
प्रैषक – मोहनसिंह रतनू, चौपासणी, जोधपुर

Shri aawad mata ji jivan prichye

श्री महामाया आवड़ा देवी ने मामड़जी मादा शाखा के यहाँ जन्म धारण किया , मामड़जी जी निपुतियां थे , एक बार अपने घर से कहीबहार जा रहे थे उस समय भाट जाति की कन्याए जो सामने से जा रही थी उन कन्याओ ने मामड़जी को देख रास्ते मे अपूठी खड़ी हो गईक्योकि सुबह के समय निपुतियें व्यक्ति का कोई मुह देखना नही चाहता , इस बात का रहस्य मामड़जी को समझ मे आ गया , वह दुखी होकर वापिस घर आ गए , मामड़जी के घर पर आदि शक्ति का एक छोटा सा मन्दिर था , वहा पुत्र कामना से अनशन धारण कर सात दिन तकबिना आहार मैया की मूर्ति के आगे बेठे रहे , आठवे दिन उन्होंने दुखी होकर अपना शरीर त्यागने के लिए हाथ मे कटारी लेकर ज्युहीं मरनेलगे उसी समय शिव अर्धांगनी जगत जननी गवराजा प्रसन्न हुवे , उन्होंने कहा - तुने सात दिन अनशन व्रत रखा हे , इसलिए मे सात रूपोंमे तुम्हारे घर पुत्री रूपों मे अवतार धारण करुगी और आठवे रूप मे भाई भैरव को प्रगट करुँगी , तुम्हे मरने की कोई आवश्यकता नही हे , इतना कह कर मातेश्वरी अंतरध्यान हो गई ! सवंत ८०८ चैत्र शुद्धी नम शनिवार के दिन (उमट) आई नाम से अवतार धारण किया ! इसी क्रम मे होल - हुली (हुलास बाई ) , गेल - गुलीगुलाब बाई ) , राजू - रागली (रंग बाई) , रेपल - रेपली (रूपल बाई ) , साँची - साचाई (साँच बाई ) व सबसे छोटी लंगी (लघु बाई ) खोड़ियारआदि नामों से सातों बहनों कर जन्म हुवा ! जिसमे महामाया आवड़ व सबसे छोटी लघु बाई - खोड़ियार सर्वकला युक्त शक्तियाँ का अवतारबताया गया ! इस प्रकार आठवे रूप मे भाई का जन्म बताया गया , जिसका नाम मेहरखा था 
मातेश्वरी का जन्म स्थान बलवीपुर जिला सौराष्ट्र , रोहिशाला ग्राम बताया गया हे ! उस समय उक्त स्थान का अन्तिम राजा शिलादिव्य था , कुछ समय पश्चात सिंध प्रान्त जहा हिंदू शासक हमीर समा राज्य करता था उस समय अरब स्थान के सम्राट मोहम्मद कासम न जबरदस्तीराजा का धर्म परिवर्तन कराया गया था उसने बादशाह की गुलामी करते हुवे अपना नाम अमर सुमरा रख दिया , सुमरा ने अपनी प्रजा परधर्म परिवर्तन करने का अनैतिक दबाव डाला , इस प्रान्त मे चारण जाति के अनेक ग्राम थे , उन्होंने धर्म परिवर्तन का विरोध किया , इससेकुपित होकर सुमरा चारण जाति के साथ अत्याचार करने लगा तब अनेक चारण परिवार वतन छोड़कर सौराष्ट्र प्रान्त की तरफ़ चल दिए , उक्त सत्य घटना का मातेश्वरी आवड़ा माता से चारण जाति व अन्य आर्य जाति को अनार्य बनाने का कुकर्म व सुमरा शाशक के अत्याचार कावर्णन किया , महामाया ने भक्तो का दुख दूर करने के लिए सपरिवार शिन्ध प्रान्त को गमन किया , बिच रास्ते मे हाकडा नामक समुन्दर थाउसका शोषण किया उक्त आवड़ा माता ने मांड प्रदेश मे हाकडा समुन्दर था उसका शोषण करते हुवे तणोट महाराजा तणु को दर्शन देकरमहामाया पंजाब प्रान्त समासटा प्रदेश के शाशक लाखियार जाम को दर्शन देने पधारी , उक्त जाम आवड़ा माता का भगत था वह माड़ राजालणु की राजधानी अपने अधिकार मे करना चाहता था लेकिन राजा तणु भी आवड़ा माता का अनन्य भगत था , इस बाबत दोनों नरेशों कीआपसी टकराहट रुकवाते हुवे मैया ने सिंध प्रान्त हमीरा सुमरा जो आर्य प्रजा को अनार्य बना रहा था , जगत जननी ने अदृश्य रूप मेलाखियार जाम की सहायता की व सुमरा शाशक को नामोनिशान मिटा दिया ! 

आवड़जी कच्छ प्रान्त की रहने वाली थी , मामड़जी चारण की पुत्री थी, इनका जन्म ८८८ सवंत आठ सो अठयासी बताया गया हे ! माड़ प्रदेश (जैसलमेर) के भाटी शाशको की अराध्य देवी थी ! यहाँ तेमड़ा नामक दृष्ट राक्षस का संहार करने से तेमडे राय नाम से प्रचलित हुयी ! यह सात बहिने थी , कच्छ प्रान्त से सिंध प्रान्त से हाकड़ा नामक समुन्दर का अस्तित्तव मिटाकर माड़ प्रदेश में अपना निवास स्थान बनाया जहा प्रजा पालक भाटी शासको की हमेशा सहायक रही!वर्तमान में माड़ प्रदेश में रहेनेवाली चारण जातियों में प्रमुख बारहट, रतनु आदि शाखा ओ का उदय आवड जी के समय के बाद हुवा हे ! 
श्री मेहाजी कीनिया रचित काव्य :- 
कवि मेहाजी वंदना करते हुवे कहते हे की मैया शुम्भ निशुम्भ नामक असुरो का संहार करने वाली देवी आवड तुम हो , तुम्हारी राम , शिव , ब्रह्मा, महेश आदि देव हमेशा तपस्या और वाणी से स्मरण करते हे , तुम आवड देवी आदि अनंत हो में आपकी वंदना करता हु ! 

कवि कहते हे मातेश्वरी आप ने अपनी अलख रूपी इच्छा शक्ति से चारण देव मामड जी के घर दुःख दूर करने और भक्तो को आनंदीत कर ने के उद्देश्य से सात बहिनों और एक भाई के रूप में पालणे में शशरीर रूप प्रगट किया , प्रूव में असुरो का वध करने वाली मैया आपने आवड नाम धारण किया , शुम्भ , निशुम्भ जैसे अनेको असुरो को नाश करने वाली आवड आदि आप ही हो ! 

मैया के जन्म स्थान के बारे में कवि कहते हे , आपने चेलक नामक ग्राम में मामड जी के घर जाल नामक वृक्ष को पोधे का रोपण किया जो बहूत पुराना वृक्ष था , जिसकी श

सदा सहाय बेग आय, हाण दोख हारणी।

🚩करणी शरणम्🚩
=============
 रिछपाल बारहठ रजवाडी़
         !! दोहा !!
पैली सुरसत प्राथना ,
करू निमण कर जोड़ !
हियै विराजो कर हरख ,
काटो विघन किरोड़ !!

साय रहिजै मेह  सुता ,
रख जे सुत री लाज !!
आखर दे मां उज्जला,
लहां शरण हिगलाज !!

सुरसत आखर सांपजै ,
दध आखर दिय टाल !
उक्ती दे मां ईशवरी ,
रख शरणै रिछपाल !!

 🙏छन्द जात-नाराच🙏
==================
(रिछपाल सिंह बारहठ कृत)
-------------🚩-------------
पुजूँ प्रभात जोड़ हाथ,
आव मात ईसरी!
रखो रुखाळ हो कृपाळ,
 मात थे महेसरी !
करूँ पुकार ले अधार,
धीर भीर धारणी
सदा सहाय बेग आय,
हाण दोख हारणी।।(1)

डुबी जहाज देय आवाज,
 तार जै शाह नै!
गऊ दुहेन्त तारयो,
 बधाय मात बाँह नै !
करी सहाय जोग माय,
 आय भवा तारणी!
सदा सहाय बेग आय,
हाण दोख हारणी।।(2)

बचाय आज मात लाज,
 आय बेर बंकरी!
कियो ज कैद सिंध में
छुडा़य शेख शंकरी!
भरी उडाण आसमाण,
भ्रात ल्याइ चारणी!
सदा सहाय बेग आय,
हाण दोख हारणी।।(3)

बिकाण बंक रो सुजाण,
राण ध्याव्व राजला!
तुरक्क तूझ होवतां ,
बिगाड़ चाव्व काजला!
बिचाळ छोड़ बाछडा़,
नोरजा छुटावणी  !
सदा सहाय बेग आय,
हाण दोख हारणी।।(4)

धरा धुजाण अगवाण ,
 ल्याय माय भैरवां !
घमंक बाज घूघरा ,
बजात संग डेरवाँ !
रमंत रास मात खास ,
दिलाँ दया धारणी !
सदा सहाय बेग आय,
हाण दोख हारणी।।(5)

सुणंत टेर आ अबेर,
देर मात ना करी !
करंत दया रिधू मया,
ढील डील ना धरी !
रही छत्राळ माँ डढाळ,
सार काज सारणी!
सदां सहाय बेग आय,
हाण दोख हारणी !! (6)

नमूँ हमेश माँ रिधेश ,
लेय सार दास री !
अट्टल है अधार मात,
पूर आश खास री!
पात पाल रीछपाल,
आल को उबारणी!!
सदां सहाय बेग आय,
हाण दोख हारणी!!(7)
================
           !! छप्पय !!
जय करणी जगदम्ब,सुणो माँ साद हमारो!
जय करणी जगदम्ब, आय माँ कष्ट निवारो!
जय करणी जगदम्ब, एक है आसरो थाँरो !
जय करणी जगदम्ब,आय कर पूत उबारो।
सेवक तणी रहिज्यो सदा, रक्षक मात राजेश्वरी।
करजोड़ रिछपाल कहे,सुणो साद परमेसरी ।।
🙏🙏🙏🙏🚩🙏🙏🙏🙏
रिछपाल सिंह बारहठ **रजवाडी़** कृत

सोमवार, 7 अक्टूबर 2019

Barh Maso

बारह मासो 
दोहा 
समरुं माता सरसती , अविचल वाणी आप ।
गुण गावूं गोविंद रा , टळे भवो भव पाप ।।1।।
कान छोड़ हमको गया , सघळे गोपी साथ ।।
प्रभु आय द्वारापुरी , राज करे रघुनाथ ।।2।।
म्हें रहूं गोकुळ गाम में , कान बतावो कोय ।।
अब जंखना ऐसी करुं ,श्याम संदेशो सोय ।।3।।
विधाता तमने विनवूं ,नहीं नेड़ो इ नेठ ।।
ऐकर माधव आवजो , जद आयो आ जेठ ।।4।।
छंद जाट सारसी 
अब जेठ आयो लहर लायो संत सायो सामने 
जादव जायो नाथ नायो केंण कायो कामने 
मन वेंण वाता रंग राता गोपी गाता ज्ञान ने
भरपूर जोबन मांय भामण कहे राधा कान ने ।।1।।
दोहा:- 
दिनड़ा गिणत मास गया ,काळी घटा घन काढ़ ।।
ऐकर माधव आवजो  आयो मास आषाढ़ ।।
छंद
आषाढ़ आतो मेघ मातो वाय वातो वादळां 
धर नीर धारा ऐम मोरा सांमी कोरा सांभळां
वाजीन्त्र वाजा गिरी गाजा मेली माजा मानने
भरपूर जोबन .................................।।2।।
दोहा
त्रिजो बेठो तव हिंसके , ऐणे पूरी आस ।।
अलबेला अब आवजो , (मन) मोहे सावण मास ।।
छंद
श्रावण सारा जरे जारा केक तारा कामणी 
पेरे पटोळा रंग रसोळा भमे टोळा भामणी
शिणगार सजिये रूप रजिये अलील तजिये आमने 
भरपूर जोबन ...................................।।3।।
दोहा
नह आवो तो नाथजी ,पाड़िश म्हारा प्राण ।।
गड़ड़ड़ अम्बर गाजियो , जोर भाद्रवों जाण ।।
छंद 
भ्रमाय भाद्रव दहे दाद्रव अब जादव आवता 
ग्रहे हेक गोरा साद सकोरा बहु मोरा बोलता
सत वेण सारूं मन म्हारूं धरे तारा ध्यान ने 
भरपूर जोबन ................................।।4।।
दोहा
सात्राळ मों सहेलियां , रंग भेनुं ब्रज रास ।।
अलबेला अब आवजो , मोहकारी आसो मास ।।
छंद 
आसो ऐम करुं केम प्रीति ऐम पूरीये ।
ओसिन्त्र आवे नींद नावे मन भावे मोहीये
नीर झरे नेणें जम जेणे सांम वेणे  सानने
भरपूर जोबन..................................।।5।।
दोहा 
सरवे आसो चालियो , हुओ मन अधक हुल्लास ।।
राधा कहि सुण गोपिका  कही कारतक मास ।।
छंद
कारतक मासो आवे आसो मन सासो मावजी 
जोवे फेर जाती रूड़े राती लता.गोपी लावजी
बुधवन्त डाया वेण वाया कणें काया कानने 
भरपूर जोबन.….......…....................।।6।।
दोहा 
संभा दौड़ी सांभळे , थीर नहीं मन थाय ।।
आवो व्रजवासी अबे , मगसर महिना मांय ।।
छंद
मगसर माधा मन बाधा जोवे राधा राजिये 
गल गोप गेली बाळ बेली प्रीत पेली पोहिये 
सोळ सो सहेली खेल खेली अलबेली आनने
भरपूर जोबन…...............................।।7।।
दोहा 
धीरज राख़ो माधवा  राख़ो नह मन रोष ।।
दाड़ा जावे दोयला , प्रभू बेठो पोष ।।
छंद
पोष ज पेला मन मेला अलबेला आणिये 
तलखत संतर ऐम अंतर दहि थर थर दाझिये
कांनड़ काळा छो छोगाळा मर्म माळा मानने 
भरपूर जोबन……...............................।।8।।
दोहा 
सिणगार पहन शोभता , गीत घरो घर गाय ।।
तोरण बांध्यो अंब तणो , माह महीने मांय ।।
छंद
माह कारी जाय भारी नेह जारी नेण थी 
सोहे सँभारी नेण धारी वारी वारी वेण थी 
मुंजे छे माथण हाले हाथण सर्वे साथण सानने
भरपूर जोबन........................................।।9।।
दोहा 
कपटी नावे कानजी , गिरधर गोकुळ गाम ।।
सुवास लगे सुहामणो ,फागण फूल फलाम ।।
छंद 
फागण फंगा शोभे रंगा आप संगा ओपिये 
मुळरंग माया नींद न आया कंस काया कोपिये 
भामण भोळी रमे होळी तेम टोळी तांनने
भरपूर जोबन.......................................।।10।।
दोहा
अबळा अरजी आपिये , खुद राधा मन खंत ।
नेण चोधारा नीसरे , चेत्र लागो  समंत ।।
छंद
चैत्र सांमी गरुड़ गामी अंतर जांमी आविये 
गिरधर धारण कंस मारण धेन सारण धाविये
ब्रज बाळा सो छोगाळा वेश काळा वांनने
भरपूर जोबन.......................................।।11।।
दोहा
अढारे भार एक दृढ़ा  ,वीठल  फाळा वन्न ।।
कोयलड़ी टहुका करे , वैशाख वेळा दन्न ।।
छंद 
वैशाख वळियो फूल फळियो ऐम वळियो आवियो 
निरखंत नितंग राज रितंग गोपी गीतंग गावियो 
मन मांय मधुरो प्रेम पूरो गाय भूरो ज्ञानने 
भरपूर जोबन .…............................।।12।।
रचना कृत कानजी बारोट (टंकन मीठा मीर डभाल)

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